हे मानव! हमसे सीखो — एकता, साहस और बलिदान की सीख दे गए बंदर। मगरमच्छों की नदी में कूद पडा 200 बंदरों की झुंड ।
रामसेतु के वानर फिर जीवित हुए — दोस्त के लिए मौत से भिड़ गए
बस्तर की माटी न्यूज़ (BKM NATIONAL NEWS),गरियाबंद
मनुष्य स्वयं को संसार का सबसे बुद्धिमान, श्रेष्ठ और विवेकशील प्राणी मानता है। उसे लगता है कि बुद्धि केवल उसके पास है, संवेदना उसी की बपौती है और एकता का अर्थ वही समझता है। लेकिन उड़ीसा के केंद्रपाड़ा जिले के महाकालपाड़ा क्षेत्र में घटित एक घटना ने मानव समाज के इस भ्रम को पूरी तरह झकझोर कर रख दिया है। यहाँ बंदरों के एक झुंड ने वह कर दिखाया, जो आज का तथाकथित सभ्य समाज शायद सोच भी नहीं पाता।

यह घटना खरा नाशि नदी की है — वही नदी जो मगरमच्छों के लिए बदनाम है, जहाँ इंसान भी कदम रखने से पहले सौ बार सोचता है। बताया जा रहा है कि एक मगरमच्छ ने नदी किनारे मौजूद एक बंदर को अचानक पकड़ लिया और उसे पानी के भीतर खींचने लगा। यह दृश्य देखते ही जंगल में अफरा-तफरी मच गई। लेकिन जो इसके बाद हुआ, वह इतिहास और वर्तमान को जोड़ने वाली एक जीवंत मिसाल बन गया।

लगभग 200 बंदरों का झुंड, बिना किसी योजना, बिना किसी डर और बिना अपनी जान की परवाह किए, एक साथ नदी में कूद पड़ा। यह वही बंदर थे जिनके बारे में कहा जाता है कि वे पानी से डरते हैं, तैरने से कतराते हैं और नदी से दूरी बनाए रखते हैं। लेकिन जब दोस्त पर संकट आया, तब डर, कमजोरी और स्वार्थ — सब पीछे छूट गए।

मगरमच्छ पानी का राजा माना जाता है। उसकी ताकत बंदरों से हजार गुना अधिक होती है। इसके बावजूद बंदरों ने नदी को चारों ओर से घेर लिया, तैरते हुए मगरमच्छ तक पहुँचे और अपने साथी को बचाने की हर संभव कोशिश की। जंगल से लेकर नदी के हर कोने तक उन्होंने संघर्ष किया। दुर्भाग्यवश वे अपने साथी को बचाने में सफल नहीं हो सके, लेकिन उन्होंने पूरी दुनिया को यह संदेश दे दिया कि एकता और बलिदान हारते नहीं हैं, वे उदाहरण बन जाते हैं।

यह दृश्य देखते ही लोगों को सत्ययुग की वानर सेवा की याद आ गई। वही वानर जिन्होंने भगवान श्रीराम के लिए रामसेतु का निर्माण किया था। तब भी न उनके पास साधन थे, न शक्ति — केवल भक्ति, एकता और संकल्प था। आज युग बदल गया, समय बदल गया, लेकिन वानरों का मूल स्वभाव नहीं बदला। तब राम के लिए समुद्र लांघा था, आज दोस्त के लिए मगरमच्छों की नदी में कूद पड़े।


आज के समय में यदि किसी इंसान पर विपत्ति आती है, तो पहले लोग मोबाइल निकालते हैं। फोटो, वीडियो, रील और सेल्फी का दौर शुरू हो जाता है। मदद बाद में, रिकॉर्डिंग पहले। लेकिन यहाँ बंदरों ने बिना किसी दर्शक, बिना किसी स्वार्थ और बिना किसी पुरस्कार की उम्मीद के अपने प्राण दांव पर लगा दिए।
यह वीडियो और तस्वीरें अब केवल भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में वायरल हो रही हैं। लोग कह रहे हैं — “हम बंदरों से ही विकसित हुए हैं, लेकिन उनसे सीखना भूल गए हैं।” यह घटना मानव समाज को आईना दिखाती है कि तकनीक, डिग्री और पद से बड़ा होता है संवेदनशील हृदय।
उड़ीसा के महाकालपाड़ा की यह नदी आज केवल मगरमच्छों के लिए नहीं, बल्कि एकता के इतिहास के लिए भी जानी जाएगी। यह घटना कहती है—
हे मानव! अगर इंसान बने रहना है, तो प्रकृति और उसके जीवों से सीखो।
क्योंकि कभी-कभी सबसे बड़ी सीख
सबसे निःस्वार्थ प्राणी दे जाते हैं।

