तंबाकू उत्पादको के दाम में अचानक से आई तेजी । लोग हुए परेशान
बस्तर की माटी न्यूज़ (BKM NATIONAL NEWS), गरियाबंद के विशेष रिपोर्ट
कहते हैं महंगाई जब मुस्कुराती है, तो सबसे पहले गुटखा थूकता है।
अमलीपदर और देवभोग क्षेत्र में इन दिनों तंबाकू उत्पादों ने ऐसा रेट पकड़ा है कि उपभोक्ता का मुंह खुला है और जमाखोरों की जेब। कभी जो गुटखा ₹10 में दो मिला करता था, आज वही ₹20 में तीन और ₹30 में चार की “महान उपलब्धि” के साथ बेचा जा रहा है। गुड़ाखू की तो कहानी ही अलग है—₹10 से सीधा ₹20 और कहीं-कहीं तो ₹30, वो भी कम परिमाण में। यानी दाम बढ़ा, मात्रा घटी और मज़ा… सिर्फ दुकानदारों को।

स्थानीय उपभोक्ताओं का कहना है कि जैसे ही सरकार ने तंबाकू उत्पादों पर जीएसटी बढ़ाई, वैसे ही जमाखोरी और कालाबाजारी ने पान की दुकान से निकलकर पूरे बाजार को अपनी गिरफ्त में ले लिया। गुटखा, पुड़िया, गुड़ाखू, बीड़ी और सिगरेट—हर चीज़ अचानक “दुर्लभ प्रजाति” बन गई। मांग है, पर सप्लाई ऐसे गायब है जैसे परीक्षा में सिलेबस।
अमलीपदर बाजार में हालत यह है कि ग्राहक पूछता है—“भइया गुटखा?”
दुकानदार जवाब देता है—“है, लेकिन भाव सुन लोगे तो छोड़ दोगे।”

सरकार के जीएसटी बढ़ाने का असर ऐसा पड़ा है कि कुछ दुकानदारों ने इसे “सुनहरा मौका” मान लिया। तय मूल्य को ताक पर रखकर मनचाहे दाम वसूले जा रहे हैं। न रेट लिस्ट दिखती है, न मात्रा पूरी मिलती है। उपभोक्ता मजबूर है—या तो महंगा खरीदे, या आदत छोड़े। और आदत छोड़ना… वो भी अचानक… यह भारत है जनाब!

इस पूरे मामले पर जब हमने सहायक खाद्य अधिकारी कुसुमलता से बात की, तो उन्होंने साफ कहा—
“तय मूल्य से अधिक दामों पर तंबाकू जनित किसी भी उत्पाद की बिक्री गलत है। दुकानदारों को जिस दर पर माल खरीदा गया है, उसी दर पर बेचना होगा। जब तक नया स्टॉक नए दाम पर नहीं आता, पुराने माल को पुराने रेट पर ही बेचा जाना चाहिए। आपके माध्यम से यह जानकारी मिली है, जल्द ही क्षेत्र में कार्रवाई की जाएगी।”

कागज़ों में यह बयान सख्त है, लेकिन ज़मीनी हकीकत थोड़ी ढीली। क्योंकि सरकारी चेतावनी के बावजूद दुकानों में उपभोक्ताओं को 20–30 प्रतिशत तक अधिक मूल्य पर सामान बेचा जा रहा है। सवाल यह नहीं कि कानून क्या कहता है, सवाल यह है कि कानून सुन कौन रहा है?

अमलीपदर के ग्रामीण कृष्णकांत त्रिपाठी बताते हैं,
“जिस गुड़ाखू को कुछ दिन पहले ₹10 में ले आता था, आज वही ₹30 में मिल रहा है। रोज़मर्रा की आदत है, छोड़ भी नहीं पा रहे, और खरीदकर जेब भी खाली हो रही है।”
कृष्णकांत अकेले नहीं हैं। बाजार में ऐसे कई उपभोक्ता हैं जिनकी नाराज़गी अब सिर्फ चर्चा तक सीमित नहीं रही। पहले जीएसटी की मार, अब दुकानदारों की मनमानी—दोनों ने मिलकर आम आदमी को तंबाकू से ज़्यादा ‘धुएं’ में डाल दिया है।

व्यंग्य यह है कि एक तरफ सरकार स्वास्थ्य के नाम पर टैक्स बढ़ाकर तंबाकू से दूर करने की नीति बनाती है, वहीं दूसरी तरफ उसी नीति की आड़ में जमाखोर “सेहत के दुश्मन” बनकर मुनाफा कूट रहे हैं। यानी सेहत गई, जेब गई और फायदा… हमेशा की तरह बीच वालों को।
अब देखने वाली बात यह होगी कि विभाग कब सिर्फ बयान से आगे बढ़कर मैदान में उतरता है। क्या सच में जमाखोरों पर कार्रवाई होगी? क्या तय मूल्य पर बिक्री सुनिश्चित की जाएगी? या फिर यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा, और उपभोक्ता हर बार की तरह महंगे गुटखे के साथ चुपचाप समझौता कर लेगा?
फिलहाल अमलीपदर और देवभोग में तंबाकू नहीं, सवाल जल रहा है—
कानून का धुआं दुकानदारों की आंखों में कब जाएगा?

