बीमार कुत्ते, डरा हुआ इलाका
बस्तर की माटी न्यूज़ (BKM NATIONAL NEWS), गरियाबंद की विशेष रिपोर्ट
अमलीपदर और आसपास के क्षेत्र इन दिनों किसी जंगली जानवर से नहीं, बल्कि बीमार आवारा कुत्तों से फैली दहशत में जी रहा है। कुत्तों के शरीर से झड़ते बाल, मोटी परत और लाल-सफेद धब्बे लोगों के मन में डर पैदा कर रहे हैं। सवाल सीधा है—कहीं यह बीमारी इंसानों तक तो नहीं पहुंचेगी?

बीमारी से ज़्यादा खतरनाक सरकारी बेपरवाही
स्थानीय लोगों का कहना है कि बीमारी से ज़्यादा डर प्रशासन की चुप्पी का है। लोग शिकायत कर रहे हैं, सवाल उठा रहे हैं, लेकिन जवाब देने वाला कोई नहीं। ऐसा लगता है जैसे समस्या को जानबूझकर अनदेखा किया जा रहा हो, क्योंकि मामला “कुत्तों” का है।
अस्पताल है,ताला है,पर डॉक्टर नहीं

मोबाइल वेटनरी यूनिट _ भरोसे का संकट
बीच-बीच में मोबाइल वेटनरी हेल्थ यूनिट आती भी है, तो इतनी अनियमित कि लोगों का भरोसा टूट चुका है। बीमारी रोज़ फैल रही है, लेकिन इलाज कभी-कभार। सवाल यह है कि जब स्वास्थ्य सेवा ही अनिश्चित हो, तो संक्रमण पर नियंत्रण कैसे होगा?

डॉक्टर बोले _ बीमारी साधारण, इलाज संभव
बस्तर की माटी न्यूज़ से बातचीत में पशु चिकित्सक डॉ. विभीषण कश्यप ने स्पष्ट किया कि यह वार्मिंग डिसऑर्डर है। सही दवाइयों, इंजेक्शन और एंटी-एलर्जी उपचार से बीमारी पूरी तरह ठीक हो सकती है। लेकिन विडंबना यह है कि दवा मौजूद है, देने वाला कोई नहीं।

अब घरेलू कुत्ते भी चपेट में
चिंता की बात यह है कि बीमारी अब घरों में पाले जाने वाले कुत्तों तक पहुंच चुकी है। यानी खतरा अब सड़कों से निकलकर घरों के दरवाज़े तक आ गया है। इसके बावजूद न विभाग जागा, न कोई सामाजिक संगठन सक्रिय हुआ।
“कुत्ता है… इंसान थोड़ी है!”

अगर यही बीमारी किसी इंसान, गाय या घोड़े में फैलती, तो शायद बैठकें होतीं, आदेश निकलते और टीमें मैदान में उतरतीं। लेकिन मामला कुत्तों का है, इसलिए न संवेदना है, न तत्परता। सवाल साफ है—अगर कल यह बीमारी इंसानों तक पहुंची, तो जिम्मेदार कौन होगा? कुत्ता या वह सिस्टम, जो आज भी चैन की नींद सो रहा है?

