“तीन लक्ष्मण रेखा में कैद पानी, खेत देख रहे सूखा का सीन”
“12 फीट नीचे का साइपन, 14 फीट ऊपर का सपना — पानी गायब, दावा अपना!” सलाम हो उस इंजीनियर को जिसने बनाया यह मुद्दसीमा !
बस्तर की माटी न्यूज़(BKM NATIONAL NEWS),गरियाबंद
त्रेता युग में लक्ष्मण ने माता सीता की रक्षा के लिए लक्ष्मण रेखा खींची थी। यहां कोटरी नाल डायवर्सन में सिंचाई विभाग ने भी तीन-तीन लक्ष्मण रेखाएं खींच दीं — फर्क बस इतना कि वहां रेखा सुरक्षा के लिए थी, यहां रेखा पानी को रोकने के लिए!

दिल्लीपारा रोड के आखिरी छोर पर पहली कटिंग,
मरघट के पास दूसरी चोट,
और हरिजन पारा के पीछे तीसरी क्रॉसिंग —
ऐसा लगता है मानो कैनाल नहीं, पानी के खिलाफ साजिश की चार्जशीट तैयार की गई हो।

भेजी पदर जल प्लावन कैनाल का सपना 1500 हेक्टेयर खेतों तक पानी पहुंचाने का था — डेंडो पदर, गोला माल, छैल डोंगरी, धारनी धोड़ा तक हरियाली लाने का दावा। लेकिन हकीकत यह है कि पांच-छह साल बाद भी खेतों तक पानी नहीं, केवल भाषण और आश्वासन पहुंचा। पहले जहां 600 हेक्टेयर में सिंचाई होती थी, अब 150 हेक्टेयर में ही पानी सिमट गया। विकास की यह “रिवर्स गियर टेक्नोलॉजी” शायद नई शोध का विषय हो सकती है।

सबसे बड़ा अजूबा है 12-14 फीट गहरा साइपन चेंबर। दावा — पानी नीचे से आएगा, ऊपर चढ़ेगा और फिर खेतों तक जाएगा। पर आज तक उस चेंबर से एक बूंद भी बाहर नहीं निकली। लगता है पानी भी इंजीनियरिंग ड्राइंग देखकर कन्फ्यूज हो गया।
सुखा तेल नदी पर एनिकट की रूपरेखा पहले भेजी पदर के पास बनने वाली थी, मगर राजनीति की धारा में बहकर अमलीपदर पहुंच गई। राइट कैनाल सड़क के आगे बढ़ने से पहले ही ठिठक गया — जैसे उसे भी एहसास हो गया हो कि आगे बढ़कर क्या करना, जब पानी ही उपलब्ध नहीं।

गोला माल के पास खुदाई में बड़े-बड़े पत्थर निकले तो ठेकेदार ने उन्हें “प्राकृतिक लक्ष्मण रेखा” मानकर छोड़ दिया। यानी कुदरत ने जो रोड़ा अटकाया, उसे हटाने के बजाय योजना में ही शामिल कर लिया गया। यह चौथी लक्ष्मण रेखा प्रकृति के नाम!
किसानों की स्थिति डबल झटके वाली है —
जिनके खेत से कैनाल गुजरा, उन्हें पूरा मुआवजा नहीं मिला।
जिनके खेत तक पानी जाना था, वहां पानी नहीं पहुंचा।
योजना कागज पर बहती रही, खेतों में सूखा पसरा रहा, और अफसरों की फाइलों में “सिंचित क्षेत्र” बढ़ता रहा।


1975-76 में बना कोटरी नाल डायवर्सन आज भी किसानों की नजर में “काम करने वाला सिस्टम” है। पर नई भव्य योजना ने पुराने हक को भी काट दिया। पुरानी कनाल में अब कहीं पेड़ उग आए हैं, कहीं कब्जे हो गए हैं, और बीचों-बीच खड़ी कंक्रीट की दीवार देखकर लगता है जैसे किसी ने कैनाल का पेट चीर दिया हो।
करोड़ों खर्च कर सपना दिखाया गया —
पर खेतों में पानी नहीं, सिर्फ वादों की नमी पहुंची।
इस पूरे सीन को देखकर मन में कई सवाल खड़े होते हैं जैसे_
क्या यह योजना सचमुच पानी पहुंचाने के लिए बनी थी?
या मुआवजा घोषित कर वोट बैंक सींचने की नई तकनीक है?
क्यों एक कैनाल ही दूसरे कैनाल का दुश्मन बन बैठा?
और आखिर किसानों की प्यास कब बुझेगी —फाइलों में, भाषणों में, या सचमुच खेतों में?

