5G के दौर में भी छुआछूत की दीवार: गरियाबंद के आंगनबाड़ी केंद्रों में नहीं बन रहा गरम भोजन, बच्चों का पोषण और सहायिकाओं का सम्मान दोनों संकट में
बस्तर की माटी न्यूज़ (BKM NATIONAL NEWS),गरियाबंद
एक तरफ देश 5G से 6G तकनीक की ओर बढ़ रहा है, वहीं दूसरी तरफ समाज के कुछ हिस्सों में आज भी छुआछूत जैसी कुप्रथाएं जिंदा हैं। छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले के मैनपुर ब्लॉक के कई आंगनबाड़ी केंद्रों में यही कड़वी हकीकत सामने आई है, जहां अनुसूचित जाति की सहायिकाओं के हाथ का बना खाना खाने से इंकार करने के कारण बच्चों को मिलने वाला गरम पोषण आहार प्रभावित हो रहा है।

मैनपुर क्षेत्र के खरी पथरा, घुमरा पदर, अमला भाटा, सियाल लाटी, मदांग मुड़ा,अमलीपदर और धरनी धोड़ा जैसे आंगनबाड़ी केंद्रों में छुआछूत की मानसिकता के चलते नियमित रूप से गरम भोजन नहीं बन पा रहा है तो कहीं दाल चावल व रसोई करने का सामान भी उपलब्ध नहीं है और ना ही उसका बिल भी बन पा रहा है। कहीं बच्चों को केवल रेडी-टू-ईट देकर काम चलाया जा रहा है, तो कहीं एक दूसरे का कार्य तो और कहीं आपसी सहमति से दूसरी सहायिका या किराए की महिला से खाना बनवाया जा रहा है।
यह स्थिति न केवल सरकारी नियमों के खिलाफ है, बल्कि इससे बच्चों को मिलने वाले आवश्यक पोषण पर भी सीधा असर पड़ रहा है।
अमला भाटा का मामला पहले भी सुर्खियों में
अमला भाटा आंगनबाड़ी केंद्र का मामला पिछले साल भी सामने आया था। उस समय खबर सामने आने के बाद भीम आर्मी के प्रमुख नेता चंद्रशेखर आजाद “रावण” ने इस मुद्दे को संसद में उठाने की बात कही थी जो कि उसे समय सोशल मीडिया पर काफी वायरल हुआ था। इसके बावजूद स्थिति में कोई खास बदलाव नहीं आया और समस्या आज भी जस की तस बनी हुई है।

हाल ही में उड़ीसा के केंद्रपाड़ा जिले में भी इसी तरह का मामला सामने आया था, जिसे लेकर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने संसद में आवाज उठाई थी। इस मुद्दे ने पूरे देश में सामाजिक भेदभाव और छुआछूत की कुप्रथा पर फिर से बहस छेड़ दी थी।
सम्मान पर भी चोट
जब किसी अनुसूचित जाति की महिला के हाथ का बना खाना बच्चे नहीं खाते, तो यह सिर्फ भोजन का मामला नहीं रहता, बल्कि उस महिला के आत्मसम्मान और सामाजिक गरिमा पर भी सीधी चोट होती है। इसे कई लोग परंपरा या जाति प्रथा का नाम देते हैं, लेकिन असल में यह अमानवीय सोच और सामाजिक भेदभाव को दर्शाता है।
आज जब देश विकास और आधुनिकता की बात करता है, तब भी इस तरह की मानसिकता समाज के लिए एक गंभीर सवाल खड़ा करती है।
प्रशासन का बयान
इस मामले में महिला एवं बाल विकास विभाग के जिला कार्यक्रम अधिकारी अशोक कुमार पांडे का कहना है_
“हम इस मामले में जन-जागरूकता अभियान चलाएंगे, ताकि माहौल सकारात्मक और सौहार्दपूर्ण बना रहे। किसी भी सहायिका को केवल इस आधार पर नहीं हटाया जा सकता कि बच्चे उनके हाथ का खाना नहीं खा रहे हैं, क्योंकि यह उनका मौलिक अधिकार भी है। हमारा प्रयास रहेगा कि सभी पक्षों से संवाद कर समाधान निकाला जाए, जिससे बच्चों को भी उनका पूरा अधिकार और पोषण मिल सके।”
— अशोक कुमार पांडे, डीपीओ, महिला एवं बाल विकास विभाग, गरियाबंद
तकनीक और विकास के इस युग में भी अगर समाज छुआछूत की सोच से बाहर नहीं निकल पा रहा है, तो यह केवल एक प्रशासनिक समस्या नहीं बल्कि सामाजिक चेतना का प्रश्न है।
अगर आंगनबाड़ी जैसे बच्चों के पोषण और भविष्य से जुड़े केंद्र भी इस मानसिकता की भेंट चढ़ जाएं, तो यह आने वाली पीढ़ी के लिए भी चिंताजनक संकेत है।
समाज को यह तय करना होगा कि वह बच्चों के पोषण और इंसान के सम्मान को प्राथमिकता देगा या फिर सदियों पुरानी कुप्रथाओं को।

