परीक्षा सर पर, बच्चे महुआ के पेड़ों के नीचे ।
परीक्षार्थी दौड़ रहा है आगे आगे, शिक्षक पड़े पीछे !
गरियाबंद में शिक्षा बनाम महुआ – शिक्षक कर रहे “परिक्षार्थी खोज अभियान”
बस्तर की मां की न्यूज़ (BKM NATIONAL NEWS),गरियाबंद
गरियाबंद जिले के ग्रामीण इलाकों में इन दिनों एक अनोखा “सीजन” चल रहा है। एक तरफ स्कूलों में वार्षिक परीक्षाओं का मौसम है, तो दूसरी तरफ जंगलों में महुआ का। फर्क बस इतना है कि परीक्षा की घंटी स्कूल में बज रही है और बच्चों की उपस्थिति महुआ के पेड़ों के नीचे दर्ज हो रही है।

हालात ऐसे हैं कि स्कूलों में परीक्षा तो तय समय पर शुरू हो रही है, लेकिन कई बच्चों की “ड्यूटी” अभी भी महुआ बीनने में लगी हुई है। नतीजा यह कि अब शिक्षक परीक्षा कक्ष में बैठकर बच्चों का इंतजार करने के बजाय “घर-घर परीक्षा निमंत्रण अभियान” चला रहे हैं।
कोई शिक्षक बाइक से गांवों की खाक छान रहा है, तो कोई माता-पिता को समझा रहा है कि “महुआ कल भी गिरेगा, लेकिन परीक्षा साल में एक बार ही आती है।”
क्या शिक्षक बन गए “एग्जाम रेस्क्यू टीम” ?

कई जगहों पर तो दृश्य ऐसा बन गया है मानो शिक्षक पढ़ाने से ज्यादा बच्चों को पकड़कर परीक्षा दिलाने की जिम्मेदारी निभा रहे हों।
किसी गांव में शिक्षक बच्चों को ढूंढ रहे हैं, तो कहीं उन्हें बाइक पर बैठाकर सीधे परीक्षा केंद्र तक पहुंचा रहे हैं।
एक शिक्षक ने हंसते हुए कहा,
“पहले हम बच्चों को पढ़ाते थे, अब खोजते भी हम ही हैं।”
बच्चा भागा, शिक्षक दौड़े
सालेभाठा पंचायत के बनवा पारा गांव में तो एक दिलचस्प लेकिन सोचने पर मजबूर कर देने वाला दृश्य देखने को मिला।
आठवीं की परीक्षा शुरू होने से पहले जब शिक्षक एक बच्चे को बुलाने उसके घर पहुंचे, तो बच्चे ने शिक्षक को देखते ही ऐसी दौड़ लगाई मानो परीक्षा नहीं, ओलंपिक की रेस हो।
पीछे-पीछे शिक्षक भी दौड़ पड़े।

कुछ देर के लिए गांव में ऐसा माहौल बन गया जैसे कोई खेल प्रतियोगिता चल रही हो—
एक तरफ “परीक्षा से भागता छात्र”, दूसरी तरफ “भविष्य बचाने दौड़ता शिक्षक”।
लोग देखते रह गए और सोचते रह गए कि आखिर बच्चे परीक्षा से इतनी तेजी से क्यों भाग रहे हैं।
महुआ का गणित बनाम पढ़ाई का भविष्य

ग्रामीणों की अपनी मजबूरी और गणित भी है। महुआ इन दिनों लगभग 40 रुपये किलो बिक रहा है।
सुबह-सुबह महुआ बीनने से घर में तुरंत पैसे आ जाते हैं, जबकि पढ़ाई का फायदा कई साल बाद दिखाई देता है।
बस यही “तुरंत लाभ वाला गणित” कई बच्चों को किताबों से ज्यादा महुआ के पेड़ों के नीचे खींच ले जाता है।
योजनाएं बहुत, लेकिन सोच वही पुरानी

सरकार बच्चों को स्कूल से जोड़ने के लिए मिड-डे मील, मुफ्त ड्रेस, किताबें, छात्रवृत्ति और खेलकूद जैसी कई योजनाएं चला रही है।
लेकिन कई जगहों पर जागरूकता अभी भी महुआ के पेड़ की छांव से बाहर नहीं निकल पाई है।
कई अभिभावक सोचते हैं कि
“आज महुआ बीन लो, कल पढ़ाई हो जाएगी।” लेकिन यही “कल” कई बच्चों के जीवन में कभी आता ही नहीं।

असली सवाल_
इस पूरी तस्वीर में सबसे बड़ी बात यह है कि शिक्षक हार मानने को तैयार नहीं हैं।
वे गांव-गांव घूमकर बच्चों को समझा रहे हैं, पकड़कर परीक्षा दिला रहे हैं और किसी तरह उन्हें पढ़ाई से जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं।
लेकिन सवाल आज भी वही खड़ा है—
क्या थोड़ी सी आज की कमाई के लिए हम बच्चों का कल महुआ के पेड़ों के नीचे गिरने दे रहे हैं?
क्योंकि महुआ हर साल गिरेगा…
लेकिन अगर पढ़ाई छूट गई, तो भविष्य फिर कभी नहीं उगेगा।

