“जहां होर्डिंग नहीं, वहां होनहार निकले – दो बेटियों ने चुपचाप नवोदय किया फतह”
“संसाधनों की कमी के बावजूद सरकारी स्कूल ने फिर प्राइवेट ‘ब्रांडिंग’ को दी टक्कर”
बस्तर की माटी न्यूज़ (BKM NATIONAL NEWS),गरयाबंद
गरियाबंद जिले में इन दिनों सड़कों पर शिक्षा नहीं, “एजुकेशन की एडवरटाइजमेंट” ज्यादा दिख रही है।
जहां देखिए, वहां बड़े-बड़े पोस्टर—“हमारे इतने बच्चे पास”, “हमारी शानदार सफलता”… मानो नवोदय परीक्षा नहीं, कोई फिल्म रिलीज हुई हो।

प्राइवेट स्कूलों की यह चमक-दमक देखकर ऐसा लगता है कि अगर पोस्टर लगाने से ही चयन होता, तो शायद हर चौराहे से एक-एक नवोदय टॉपर निकल आता।

लेकिन इसी शोर-शराबे के बीच, मैनपुर ब्लॉक के मुडगेल माल गांव का एक छोटा सा सरकारी प्राथमिक विद्यालय चुपचाप अपना काम कर गया।
न कोई बैनर, न कोई ब्रेकिंग न्यूज़—बस रिजल्ट आया… और दो बेटियों ने नवोदय परीक्षा पास कर ली।
इन होनहार बच्चियों के नाम हैं – खुशी नागेश और नीतू बघेल।
ना इन्होंने अखबारों में जगह मांगी, ना कैमरों को बुलाया… लेकिन इन्होंने वो कर दिखाया, जो बड़े-बड़े “ब्रांडेड स्कूल” लाखों खर्च करके दिखाते हैं।
सरकारी स्कूल: ‘धारणा बनाम हकीकत’

हमारे समाज में सरकारी स्कूल का नाम आते ही एक तयशुदा तस्वीर बन जाती है— टूटी दीवारें, कम शिक्षक, और कभी-कभी “हल्का नशे में ड्यूटी निभाते गुरुजी”। और सच कहें तो ये तस्वीर पूरी तरह गलत भी नहीं है। कई जगहों पर यही हकीकत है… यही वजह है कि माता-पिता अपनी जेब काटकर भी बच्चों को प्राइवेट स्कूल भेजते हैं।
लेकिन मुडगेल माल का यह स्कूल इस धारणा को थोड़ा असहज कर देता है।
जहां ‘ड्यूटी’ नहीं, ‘जिम्मेदारी’ पढ़ाई जाती है

इस स्कूल के प्रधान पाठक भगवान सिंह यादव और उनके साथी शिक्षक—पीलाराम नाग, मिलाप सिंह पुजारी, कुमार सिंह बघेल—
इन सबने यह साबित कर दिया कि “संसाधन बहाना हो सकता है, लेकिन जज़्बा नहीं”। ये वो शिक्षक हैं जो कम संसाधनों को “कमजोरी” नहीं, “चुनौती” और कम संसाधनों को भी शक्ति मानते हैं।और शायद यही वजह है कि हर साल यहां से बच्चे नवोदय का रास्ता पकड़ लेते हैं।

सरकार की नजर में शिक्षक एक “ऑल-इन-वन मशीन” है—
कभी सर्वे अधिकारी,कभी चुनाव ड्यूटी,कभी राशन गणना,
तो कभी जनगणना।
यानि पढ़ाई के अलावा हर काम… बस पढ़ाना बीच-बीच में।

शिक्षकों का कहना भी कम दिलचस्प नहीं है—
“अगर हमें बाकी कामों से थोड़ी राहत मिलती, तो इस साल 2 नहीं, 5 बच्चे नवोदय में होते।”
अब ये बयान सुनकर सिस्टम मुस्कुराता है…और हकीकत चुपचाप सिर हिलाती है।
प्राइवेट बनाम सरकारी – असली फर्क

प्राइवेट स्कूल_पहले पोस्टर, फिर परफॉर्मेंस
सरकारी स्कूल_ पहले परफॉर्मेंस, पोस्टर बाद में भी नहीं
एक तरफ “एडमिशन ओपन” के साथ सफलता का प्रचार बड़े-बड़े पीले कलर के बसों में तो दूसरी तरफ बिना प्रचार के सफलता खुद दरवाजा खटखटा रही है।
सीख क्या है?

मुडगेल माल का यह स्कूल कोई चमत्कार नहीं है…यह सिर्फ यह याद दिलाता है कि—अगर सही शिक्षक, सही नीयत और थोड़ा सा सहयोग मिल जाए, तो सरकारी स्कूल भी ‘ब्रांड’ बन सकते हैं।
जरूरत है—सरकार की नजर,अधिकारियों का समर्थन,
और शिक्षकों को उनके असली काम—“पढ़ाने”—पर केंद्रित करने की।

पोस्टर पर छपने वाली सफलता और जमीन पर पसीना बहाकर मिलने वाली सफलता में फर्क होता है। मुडगेल माल का यह स्कूल शायद पोस्टर में नहीं है…लेकिन असली “रिजल्ट” यहीं लिखा जा रहा है।
और अगर सिस्टम ने थोड़ा साथ दिया…
तो अगली बार पोस्टर भी यहीं से छपेंगे—
बस फर्क इतना होगा कि इस बार “शोर” नहीं, “सच्चाई” दिखेगी।

