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ग्रमीणों ने बनाया संविधान मंदिर कायम की अनोखी मिशाल

कृष्ण कुमार कुंजाम

जगदलपुर बस्तर के माटी समाचार बस्तर संभाग के जगदलपुर जिला मुख्यालय से लगभग 35 किलोमीटर दूर तोकापाल ब्लॉक के अंतर्गत बसे बुरुंगपाल गांव ने देश में एक अनोखी मिसाल कायम की है। यहां के स्थानीय जनजातीय निवासियों ने संविधान का मंदिर बनवाया है, जिसे स्थानीय भाषा में लोग ‘गुड़ी’ कहते हैं। यह मंदिर कोई भव्य इमारत नहीं, बल्कि एक साधारण आधारशिला है, जिस पर संविधान में निहित पांचवीं अनुसूची के प्रावधान और अधिकारों को अंकित किया गया है। यही आधारशिला ग्रामीणों के लिए मंदिर का स्वरूप ले चुकी है, जहां वे श्रद्धा और आस्था से पूजा-अर्चना करते हैं। लगभग दो हजार की आबादी वाले इस गांव की पहचान आज संविधान गुड़ी के कारण पूरे देश में है। 6 अक्टूबर 1992 को जब इस इलाके के मावलीभाटा में एस.एम. डायकेम कंपनी का स्टील प्लांट स्थापित करने के लिए शिलान्यास हुआ, तब आदिवासी समुदाय ने बड़े आंदोलन की राह पकड़ी। ग्रामीणों ने महसूस किया कि उनकी भूमि, जल और जंगल पर सीधा खतरा मंडरा रहा है। आंदोलन की अगुवाई तत्कालीन कलेक्टर रह चुके डॉ. बी.डी. शर्मा ने की। उन्होंने न केवल संघर्ष की रूपरेखा तैयार की, बल्कि आदिवासियों को संगठित कर उनके संवैधानिक अधिकारों के प्रति जागरूक किया। इसी संघर्ष के दौरान यहां पेसा कानून का ड्राफ्ट भी तैयार किया गया, जिसने आगे चलकर आदिवासियों की ग्रामसभा को शक्तिशाली बनाने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई। स्टील प्लांट के खिलाफ दायर याचिका पर जबलपुर हाईकोर्ट ने ग्रामीणों के पक्ष में निर्णय दिया। जिस दिन यह फैसला आया, उसी दिन को ग्रामीणों ने विजय उत्सव के रूप में मनाया और उसी ऐतिहासिक घड़ी की स्मृति में संविधान गुड़ी की नींव रखी गई। उस दिन से लेकर आज तक यह परंपरा जीवित है। इस गुड़ी में ग्रामीण संविधान को उसी श्रद्धा से मानते हैं, जैसे कोई धार्मिक ग्रंथ या देवस्थान। उनके लिए यह मंदिर केवल न्याय और अधिकारों का प्रतीक नहीं, बल्कि अस्मिता और अस्तित्व की रक्षा का केंद्र है। बस्तर अनुसूचित जनजातीय क्षेत्र है और यहां संविधान की पांचवीं अनुसूची लागू है। इस अनुसूची का मूल आधार भारत सरकार अधिनियम 1935 की अनुच्छेद 91 और 92 में निहित है। पांचवीं अनुसूची का सबसे बड़ा उद्देश्य आदिवासी समुदाय को उनके परंपरागत अधिकारों और ग्रामसभा की सर्वोच्चता को संरक्षित करना है। शायद यही कारण है कि हर वर्ष दशहरा से दो दिन पूर्व आसपास के 50 गांवों के आदिवासी, अनुसूचित जाति और ओबीसी समुदाय के लोग बुरुंगपाल में इकट्ठा होकर संविधान के प्रावधानों का वाचन करते हैं। इसके बाद सामूहिक चर्चा-परिचर्चा आयोजित होती है, जिसमें ग्रामसभा की भूमिका, अधिकार और चुनौतियों पर विचार किया जाता है। हाल ही में 27 नवंबर को यहां संविधान गुड़ी की पूजा-अर्चना संपन्न हुई। इस अवसर पर आदिवासियों ने संविधान की प्रस्तावना का सामूहिक वाचन किया और “लोकसभा न विधानसभा, सबसे बड़ा ग्रामसभा” तथा “मावा नाटे, मावा राज” जैसे नारे गूंजे। इन नारों के माध्यम से ग्रामीण स्पष्ट संदेश देते हैं कि उनके लिए ग्रामसभा ही सर्वोच्च है, क्योंकि वही उन्हें संविधान से मिली शक्ति का जीवंत प्रतीक है। साल 1992-93 के आंदोलन ने बुरुंगपाल को सिर्फ एक गांव नहीं, बल्कि संवैधानिक चेतना का केंद्र बना दिया। उस दौर में ग्रामीणों ने सामूहिक कुटिया का निर्माण किया, जहां बैठकर आंदोलन की रूपरेखा तय हुई, पेसा कानून का मसौदा तैयार हुआ और भविष्य की दिशा निश्चित हुई। अंततः ग्रामीणों की दृढ़ता के आगे फैक्ट्री प्रबंधन को अपना बोरिया-बिस्तर समेटना पड़ा। आज तीन दशक बाद भी बुरुंगपाल के लोग उसी विश्वास के साथ संविधान गुड़ी की सेवा-पूजा करते हैं। उनके लिए यह केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि लोकतंत्र की जड़ों को सींचने वाला सतत् आंदोलन है। बुरुंगपाल का यह अनूठा उदाहरण बताता है कि संविधान केवल कागज की किताब नहीं, बल्कि लोगों की चेतना और सामूहिक शक्ति का स्रोत है।

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