वर्षों से जमे लापरवाह अधिक्षिका को अभयदान ,DMC पर कार्यवाही, छात्रा की मृत्यु पर गंभीर सवाल, शैक्षणिक आवासीय व्यवस्था में गहन संकट
प्रधान संपादक की कलम से
बीजापुर बस्तर के माटी समाचार। 9 जनवरी 2056। जिले के कुटरु पोटाकेबिन में अध्ययनरत एक पाँचवीं कक्षा की छात्रा की अस्पताल में मृत्यु के मामले ने शिक्षा विभाग और आश्रमों-छात्रावासों की व्यवस्था में पनप रही गहरी खामियों, लापरवाही एवं जवाबदेही के अभाव को एक बार फिर से उजागर कर दिया है।
छात्रा को पहले ब्रेन ट्यूमर या तपेदिक के लक्षणों के साथ अस्पताल ले जाया गया था, लेकिन आरोप है कि बीमारी की गंभीरता पर शुरू में ही ध्यान नहीं दिया गया। देखरेख में चूक के कारण उसकी हालत बिगड़ती चली गई और अंततः रायपुर एम्स में उसकी मृत्यु हो गई। यह घटना आवासीय शिक्षा संस्थानों में बच्चों के स्वास्थ्य पर नजर रखने की प्रणाली पर एक बड़ा प्रश्नचिन्ह है।
अधीक्षिका की नियुक्ति और भूमिका पर उठते सवाल
मामले में सबसे विवादास्पद पहलू संबंधित अधीक्षिका की भूमिका है। आरोप है कि वर्तमान में कुटरु में पदस्थ इस अधीक्षिका को योग्यता के बजाय उनकी राजनीतिक पहुँच के आधार पर नियुक्त किया गया है। हैरानी की बात यह है कि इस मामले में जिला मिशन समन्वयक (डीएमसी) को तत्काल पद से हटा दिया गया, लेकिन सीधे तौर पर जिम्मेदार मानी जाने वाली अधीक्षिका अभी भी अपने पद पर बनी हुई है। इससे “गलती कोई करे, भर कोई” की मानसिकता की ओर इशारा होता है।
उपस्थिति रजिस्टरों में फर्जीवाड़ा और संसाधनों का दुरुपयोग
स्थानीय सूत्रों का दावा है कि आश्रमों, छात्रावासों और पोटा केबिनों में छात्र-छात्राओं की वास्तविक उपस्थिति और रजिस्टरों में दर्ज उपस्थिति में भारी अंतर है। जनवरी के महीने में भी उपस्थिति एक चौथाई बताई जा रही है, जबकि रजिस्टर भरे हुए दिखाए जाते हैं। यह सरकारी बजट के दुरुपयोग और फर्जीवाड़े का स्पष्ट संकेत है। बच्चों की पारदर्शी उपस्थिति के लिए डिजिटल प्रणाली (बायोमेट्रिक) लगाने की मांग उठ रही है।
प्रधानाध्यापकों को अतिरिक्त प्रभार देने की प्रथा भी शिक्षा की मुख्य धारा पर विपरीत प्रभाव डाल रही है। आरोप है कि ये पद अब कई अधिकारियों के लिए केवल सत्ता और संसाधनों तक पहुँच का जरिया बनकर रह गए हैं, न कि सेवा का।
- सुधार के लिए जरूरी कदम
इस गंभीर संकट से निपटने के लिए तत्काल कदम उठाने की आवश्यकता है:
1. छात्रा की मृत्यु के मामले की निष्पक्ष जाँच और दोषी अधिकारियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई।
2. आश्रम/छात्रावास प्रभारियों की नियुक्ति में पारदर्शिता और योग्यता को प्राथमिकता।
3. बच्चों की उपस्थिति और संसाधनों के उपयोग की डिजिटल निगरानी प्रणाली लागू करना।
4. इन संस्थाओं का नियमित ऑडिट और उच्चस्तरीय समीक्षा।
सरकार और प्रशासन की ओर से अब तक कोई ठोस कार्रवाई नजर नहीं आई है। यह सवाल मुंह बाए खड़ा है कि क्या एक बच्ची की मौत भी इस टूटी हुई व्यवस्था को ठीक करने के लिए पर्याप्त है, या फिर जिम्मेदार अधिकारी धृतराष्ट्र की तरह आँखें मूंदे बैठे रहेंगे?

