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पोस्टर में हेल्थ, पहाड़ में पेशेंट – भालू डिग्गी का ‘8 कंधों वाला एम्बुलेंस मॉडल’ फिर हुआ लॉन्च!”

बस्तर की माटी न्यूज़ (BKM NATIONAL NEWS),गरियाबंद

स्वास्थ्य विभाग के चमचमाते पोस्टर फिर से दीवारों पर मुस्कुरा रहे हैं—“हर गांव तक स्वास्थ्य सुविधा”, “108 हर वक्त आपके साथ”… और उधर पहाड़ों के बीच बसे भालू डिग्गी में लोग आज भी पूछ रहे हैं—“साहब, ये पोस्टर हमारे गांव तक कब आएंगे… या हम ही पोस्टर तक पहुंचें?”


कुल्हाड़ी घाट ग्राम पंचायत के अंतर्गत आने वाला भालू डिग्गी, जो कभी “नक्सल प्रभावित” टैग से पहचाना जाता था, अब “विकास प्रभावित” क्षेत्र बन चुका है। नक्सलियों की विदाई तो हो गई, लेकिन विकास अब भी रास्ता पूछ रहा है—शायद GPS में “पहाड़ी मोड” ऑन करना भूल गया है।

18 मार्च 2026 की ताजा कहानी—
एक बुजुर्ग श्याम को बुखार आया। अब बुखार कोई बड़ी बात नहीं, लेकिन जगह भालू डिग्गी हो तो यह “मेडिकल इमरजेंसी” कम और “फिटनेस चैलेंज” ज्यादा बन जाता है।

 

गांव वालों ने तुरंत 108 को कॉल किया। 108 भी बोली—“हम तैयार हैं, बस आप मरीज को हमारे पास पहुंचा दीजिए!”
बस फिर क्या था—शुरू हो गया “8 कंधों का एम्बुलेंस सर्विस”।

 

चार कंधे कम पड़ गए, तो आठ कंधों ने जिम्मेदारी उठाई। पहाड़ी रास्ता, जंगल, पगडंडी—सब पार करते हुए मरीज को नीचे लाया गया, जहां 108 गाड़ी बड़े आराम से खड़ी थी… जैसे कह रही हो—“मैं तो यहीं तक आ सकती हूं, आगे आप समझदार हैं।”
फिर मरीज को मैनपुर अस्पताल ले जाया गया, जहां से उसे गरियाबंद रेफर कर दिया गया—क्योंकि असली यात्रा तो अभी बाकी थी।

 

अब जरा तुलना कर लीजिए—
देश चांद पर पहुंचने की बात कर रहा है, और भालू डिग्गी में मरीज को अस्पताल तक पहुंचाने के लिए आज भी “मानव एम्बुलेंस” की जरूरत पड़ रही है।
स्थानीय सवाल भी बड़े सीधे हैं—
क्या 108 सेवा का नया मॉडल “पहाड़ से नीचे तक सीमित” है?

क्या स्वास्थ्य विभाग के पोस्टर भी सिर्फ सड़क किनारे तक ही वैध हैं?
और क्या विकास भी अब “लोकेशन बेस्ड सर्विस” हो गया है?
आदिवासी महिला प्रकोष्ठ की अध्यक्ष लोकेश्वरी नेताम ने भी तंज कसा—
“सरकार जहां फायदा दिखता है वहां पहाड़ काट देती है, लेकिन जहां जरूरत है, वहां पहाड़ ही बहाना बन जाता है।”

भालू डिग्गी में स्वास्थ्य सुविधा नहीं, बल्कि “स्वास्थ्य यात्रा” मिलती है—
पहले 8 कंधों का सहारा, फिर 108 का इंतजार, फिर अस्पताल का रेफर…
यानी इलाज से ज्यादा लंबा सफर, और पोस्टर से ज्यादा दूर हकीकत।
तो सवाल अभी भी वही है—
_क्या यही है “सबका साथ, सबका विकास”…
_या फिर “सबका पोस्टर, कुछ का इलाज”?

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